
अनन्त चतुर्दशी पूजा, पंचक विचार और गणेश-विसर्जन के संबंध में शास्त्रीय विवेचन……..
रायपुर/ बिलासपुर : गणेशोत्सव के समय प्रत्येक वर्ष एक प्रश्न सामने आता है कि —”यदि गणेश पक्ष या अनंत चतुर्दशी के दिन पंचक का संयोग हो जाए, तो क्या गणेशजी की प्रतिमा का विसर्जन पंचक प्रारम्भ होने से पहले ही कर देना चाहिए? कुछ लोग मानते हैं कि पंचक में सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं, जबकि अनेक परिवारों की परंपरा है कि पहले भगवान अनन्त की पूजा सम्पन्न की जाए और उसके बाद गणेशजी की उत्तर-पूजा करके उनका विसर्जन किया जाए। जब बार बार ऐसा प्रश्न उठे और जनमानस इससे भ्रमित होने लगे तब उसका एक मूल उपाय है शास्त्र सम्मत बातें।इस विषय को लेकर RK NEWS 24 के द्वारा बिलासपुर निवासी भागवताचार्य एवं ज्योतिष सलाहकार पं. श्रीप्रकाश तिवारी “श्रीरंग महराज” गोल्डमैडलिस्ट एम. ए. संस्कृत साहित्य एवं हिंदी भाषा, एम. ए. गायन संगीत, मस्तूरी वाले” के साथ एक सार्थक चर्चा किया गया ।इस विषय में श्रीरंग महराज ने शास्त्रोक्त बातें बताई जिसे हम प्रस्तुत कर रहे है।

चर्चा के प्रारंभ में आचार्य श्रीरंग ने बताया कि “लोक-मान्यता से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सर्वप्रथम हमें यह देखना चाहिए कि शास्त्र वास्तव में क्या कहता है? यदि शास्त्र में किसी विशेष कर्म का निषेध हो तो उसे मानना चाहिए, लेकिन जहाँ स्पष्ट निषेध का प्रमाण न हो, वहाँ केवल भय अथवा सुनी-सुनाई बात को शास्त्र-वचन कहकर स्वीकार कर लेना उचित नहीं है।
“पंचक” है क्या और इस दौरान कौन से कार्य वर्जित है?
आचार्य श्रीरंग ने पंचक के विषय में बताया कि ज्योतिष-ग्रंथों में धनिष्ठा के उत्तरार्ध से शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती तक के नक्षत्रों के समूह को पंचक कहा गया है। इस विषय में बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् के नक्षत्र प्रकरण में पंचक के संबंध में विभिन्न आचार्यों के मत उद्धृत हैं। जिसमें श्रीपति का मत है कि —
वासवोत्तरदलादिपञ्चके,याम्यदिग्गमनगेहगोपनम्।प्रेतदाहतृणकाष्ठसंग्रहं,शय्यकाविततनं च वर्जयेत्॥
अर्थात् पंचक के समय दक्षिण दिशा की यात्रा, गृह-आच्छादन ( निर्माण), सामान्य प्रचलित शवदाह क्रिया, तिनके और लकड़ी का संग्रह तथा शय्या आदि से संबंधित कुछ कर्मों का त्याग बताया गया है। इसी प्रकार अन्य मत में भी कहा गया है।
छेदनं संग्रहं चैव, काष्ठादीनां न कारयेत्।श्रवणादौ बुधःषट्कां, न गच्छेद्दक्षिणां दिशि॥
अर्थात् काष्ठ आदि के छेदन-संग्रह तथा दक्षिण दिशा में गमन के संबंध में भी निषेध है।
यहाँ ध्यान देने योग्य सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन शास्त्रीय प्रमाणों में कही भी देव प्रतिमा या मूर्ति के विसर्जन का स्पष्ट निषेध नहीं मिलता है। हालांकि पंचक के दौरान कुछ विशिष्ट कर्मों का निषेध है; किंतु इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि पंचक के दौरान प्रत्येक धार्मिक अथवा शुभ कर्म निषिद्ध हो जाते हो।अतः प्रमाण संगत बात यही है कि—उपलब्ध मूल प्रमाणों में कही भी देव प्रतिमा के विसर्जन के लिए पंचक-निषेध का स्पष्ट विधान प्राप्त नहीं होता। फिर चाहे वह विसर्जन गणेश जी की प्रतिमा का हो या अन्य देवी -देवताओं की।
क्या गणेश-विसर्जन स्वयं शास्त्रसम्मत है?
इसका उत्तर स्पष्ट रूप से हाँ है। बौधायन गृह्यशेष के प्रश्न ३ में विनायक-विसर्जन का प्रत्यक्ष विधान मिलता है—
“अथ साग्निकं विनायकं प्रदक्षिणं कृत्वाप्रणम्याभिवाद्य विनायकं विसर्जयति।”
यही नहीं विसर्जन के समय प्रार्थना भी की जाती है—
“कृतं यदि मया प्राप्तं श्रद्धया वा गणेश्वर।उत्तिष्ठ सगणस्साधो याहि भद्रं प्रसीदतोमिति॥”
अर्थात् विनायक की प्रदक्षिणा करके, प्रणाम एवं अभिवादन के पश्चात् उनका विसर्जन किया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि “हे गणेश्वर! श्रद्धापूर्वक मेरे द्वारा जो कुछ किया गया है, उसे आप स्वीकार करें; और अपने गणों सहित सादर मंगलऔर प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान करें।यह प्रमाण इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि विनायक-विसर्जन की धार्मिक परंपरा प्राचीन गृह्य परंपरा में विद्यमान थी। साथ ही यह प्रमाण हमें सिखाता भी है कि ग्रंथ जितना कहता है, निष्कर्ष भी उतना ही निकालना चाहिए। इसमें विसर्जन-विधि है, लेकिन यह नहीं कहा गया कि पंचक में विसर्जन निषिद्ध है।वही पार्थिव गणेश-पूजा की भी अपनी एक शास्त्रीय परंपरा है। जिसके अनुसार गणेशजी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का उल्लेख प्राचीन शास्त्रीय साहित्य में भी मिलती है। इस विषय में श्रीगणेशपुराण के उपासनाखण्ड, अध्याय ४९ में पार्थिव गणेश-प्रतिमा के निर्माण और पूजा का विधान मिलता है। जहां कहा गया है—
“मृत्तिकां सुन्दरां स्निग्धां,क्षुद्रपाषाणवर्जिताम्।
सुविशुद्धामवल्मीकां,जलसिक्तां विमर्दयेत्॥
अर्थात् सुन्दर, चिकनी, शुद्ध तथा छोटे पत्थरों से रहित मिट्टी लेकर उसमें जल मिलाकर उसका मर्दन किया जाए और उससे गणेशजी की प्रतिमा बनाई जाए।इससे स्पष्ट होता है कि पार्थिव गणेश-मूर्ति बनाना और उसकी पूजा करना केवल कोई आधुनिक उत्सव-परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रीय पूजा-पद्धति से जुड़ी परंपरा है।
अनन्त चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन का क्या महत्व है?
अब प्रश्न यह आता है—यदि गणेश-विसर्जन के लिए पंचक का स्पष्ट निषेध नहीं है, तो फिर अनन्त चतुर्दशी पर ही गणेश विसर्जन का महत्व क्यों है?
इस विषय में नारदपुराण के अध्याय १२३ में बताया गया है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को अनन्त-व्रत करने का विधान है। इस दिन भगवान अनन्त की पूजा तथा चौदह गाँठों वाले अनन्त-सूत्र आदि के बारे में।बताया गया है। इसी कारण अनन्त चतुर्दशी का अपना स्वतंत्र और प्राचीन धार्मिक महत्व है। गणेशोत्सव की वर्तमान पारिवारिक और सार्वजनिक परंपरा में भी यही तिथि गणेश-विसर्जन की प्रमुख तिथि बन चुकी है। लेकिन यहाँ भी एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है कि —अनन्त चतुर्दशी का महत्व और प्रत्येक गणेश-मूर्ति का विसर्जन केवल इसी दिन अनिवार्य रूप से होना, दोनों एक समान विषय नहीं हैं। क्योंकि विभिन्न परंपरा और क्षेत्रान्तर्गत श्री गणेश प्रतिमा का विसर्जन डेढ़ दिन, तीन दिन, पाँच दिन, सात दिन आदि के बाद भी कर दिया जाता है। अतः केवल अनंत चतुर्दशी के दिन ही गणेश प्रतिमा का विसर्जन करना यह नियम सामान्य रूप से लागू होने की अपेक्षा देश काल परिस्थिति एवं परंपराओं के रूप में स्वीकार करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि अनेक परिवारों में अनन्त चतुर्दशी के दिन पहले भगवान अनन्त की पूजा और उसके बाद गणेशजी की उत्तर-पूजा करके विसर्जन करने की परंपरा है। यदि यह किसी परिवार के कुलाचार अथवा परंपरा से जुड़ा है, तो उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे शास्त्र-विरोधी कहने का कोई स्पष्ट आधार भी नहीं दिखाई देता क्योंकि अनन्त चतुर्दशी व्रत पूजा का अपना एक अलग विशिष्ट विधान है और गणेश-विसर्जन का अपना अलग। इसलिए दोनों का क्रमपूर्वक संपादन एक स्वाभाविक धार्मिक परंपरा हो सकती है। किंतु उसे किसी शास्त्रोक्त परंपरा से जोड़ना उचित नहीं माना जाएगा।
यदि गणेश पक्ष में पंचक पड़े तब क्या करें?
बहुत से लोगों का प्रश्न होता कि कभी कभी गणेश स्थापना के बाद बीच में पंचक प्रारंभ हो जाता है यदि ऐसा योग बने तब क्या करें? अनन्त चतुर्दशी या गणेश पक्ष के दौरान पंचक का संयोग हो जाए, तो क्या केवल पंचक के कारण गणेश-विसर्जन पहले कर देना चाहिए?इस विषय में आचार्य श्रीरंग ने बताया कि “पंचक के संबंध में उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाण और उसके विशिष्ट शास्त्रीय निषेध सहित बौधायन गृह्यशेष में विनायक-विसर्जन का स्पष्ट विधान मिलता है साथ ही अनन्त चतुर्दशी का अपना एक अलग स्वतंत्र व्रत-विधान है।लेकिन इन प्रमाणों को आपस में जोड़ने के बाद भी कोई ऐसा प्रत्यक्ष मूल श्लोक सामने नहीं आता जिसमें यह उल्लेखित हो कि –
“पञ्चके गणेशप्रतिमां न विसर्जयेत्।” अथवा “पञ्चकप्रवेशात् पूर्वमेव गणेशप्रतिमाविसर्जनं कुर्यात्।” अतः केवल पंचक के नाम पर गणेश-विसर्जन को अनिवार्य रूप से पहले कर देना प्रत्यक्ष शास्त्रीय निषेध के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता।
क्या “गणेशजी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए पंचक का कोई नियम नहीं” कहना उचित है?
इस पर आचार्य श्रीरंग ने कहा कि यहाँ पर अतिशयोक्ति से बचना परम आवश्यक है। हां! गणेशजी को विघ्नहर्ता मानना हमारी धार्मिक परंपरा का मूल भाव है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि गणेश-पूजा से संबंधित प्रत्येक कर्म में सभी काल-विचार और मुहूर्त-विचार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। इस विषय में संतुलित शास्त्रीय दृष्टि यह है कि जहाँ किसी कर्म का स्पष्ट निषेध है, वहाँ उसका विचार किया जाए; और जहाँ निषेध का प्रमाण नहीं है, वहाँ केवल भय या लोकश्रुति के आधार पर निषेध न बनाया जाए। इसलिए यह तर्क प्रमाणसंगत नहीं है कि “गणेशजी विघ्नहर्ता हैं, इसलिए पंचक का कोई नियम ही नहीं”, बल्कि तर्क यह है कि -” पंचक के जिन कर्मों का शास्त्र में निषेध है, उनमें देव प्रतिमा विसर्जन का स्पष्ट निषेध उपलब्ध नहीं है।” क्योंकि शास्त्रोक्त प्रमाण और भक्ति, भावना एवं विश्वास दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों एक दूसरे के पूरक है किंतु किसी भी तर्क से किसी भी बात का एकपक्षीय खंडन भी उचित नहीं है। क्योंकि शास्त्रों में जहाँ निषेध है, वहाँ निषेध को स्वीकार करना चाहिए और जहाँ स्पष्ट निषेध नहीं है, केवल किवदंतियां या जन मत है वहाँ भय को शास्त्र का नाम नहीं देना चाहिए। साथ ही चाहे गणेश पूजा हो या दुर्गा पूजा विसर्जन उसे केवल एक उत्सवी पर्व न माने क्योंकि वह हमारे सनातन में श्रद्धा, पूजा-विधि और परंपरा से जुड़ा धार्मिक संस्कार है। अतः इसका निर्णय केवल कही सुनी बातों के आधार पर न करके तिथि, शास्त्रीय विधान, कुलाचार, स्थानीय परंपरा और उपलब्ध प्रमाणों के समन्वय से करना अधिक उचित एवं मंगलकारी है। क्योंकि यही सत्य है यही शिव है और यही सुंदर भी।।।





