
30 दिवस के भीतर ग्रेच्युटी भुगतान आदेश के बावजूद करीब नौ माह बाद हुआ 1.50 लाख का भुगतान; RTI से सामने आया पूरा मामला
मामला डॉ. सी व्ही रमन विश्वविद्यालय का,
आयोग, सहित कई अन्य शासकीय स्तरों की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे सवाल,
करगीरोड ( बिलासपुर) : डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड, कोटा की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला विश्वविद्यालय के एक पूर्व कर्मचारी की ग्रेच्युटी राशि के भुगतान में हुई लंबी देरी से जुड़ा है। उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों के अनुसार उपदान भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत सक्षम नियंत्रण प्राधिकारी के द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को विश्वविद्यालय को ग्रेच्युटी राशि भुगतान करने के आदेश देने के बावजूद भी लंबे समय तक भुगतान नहीं किया गया। प्राधिकारी कार्यालय द्वारा विश्वविद्यालय को अनेक बार पत्र जारी करने एवं विधि संगत कार्यवाही की बात कहने पर अंततः 4 अगस्त 2026 को विश्वविद्यालय ने ग्रेच्युटी की राशि भुगतान किया। विश्वविद्यालय की जवाबदेही को लेकर पूर्व में भी उठे कई मामलों ने अनेक सवाल खड़े कर दिये है ऐसे में इसप्रकार का मामला सामने आने से अब सवाल केवल ग्रेच्युटी भुगतान में देरी तक सीमित न होकर विश्वविद्यालय की शासकीय एवं नियामक निर्देशों के अनुपालन की कार्यप्रणाली और उस पर निगरानी रखने वाली व्यवस्था पर भी उठ रहे हैं।

RTI से खुला राज….. आखिर क्या है मामला?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार करगी रोड, कोटा निवासी रितेश मिश्रा ने 24 जुलाई 2026 को न्यायालय नियंत्रण प्राधिकारी, श्रम कार्यालय बिलासपुर में कर्मचारियों के ग्रेच्युटी से संबंधित जानकारी हेतु RTI आवेदन प्रस्तुत किया था। RTI से प्राप्त दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय की ग्रेच्युटी प्रकरण और उस पर हुई शासकीय कार्रवाई की जानकारी सामने आई। दस्तावेजों के आधार पर जब हमारे न्यूज चैनल ने संबंधित पूर्व कर्मचारी से संपर्क कर मामले से संबंधित जानकारी लिया , तो उन्होंने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि “उन्हें अपने वैधानिक अधिकार की राशि प्राप्त करने के लिए बिना कारण लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। संबंधित पूर्व कर्मचारी ने आगे बताया कि उसने विश्वविद्यालय में 01 अगस्त 2008 से 18 मार्च 2021 तक सेवा दिया था तथा उसकी अंतिम मासिक वेतन राशि 21,586 रुपए थी। सेवा समाप्ति के बाद सन 2023 में ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होने पर उपदान भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत नियंत्रण प्राधिकारी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया। दोनों पक्षों के दस्तावेजों और तर्कों पर विचार के बाद 28 अक्टूबर 2025 को नियंत्रण प्राधिकारी ने 1,50,240 रुपए की ग्रेच्युटी राशि का भुगतान करने का आदेश विश्वविद्यालय के नाम जारी किया। के बाद भी उसे ग्रैजुएटी की राशि प्रदान नहीं की गई। इधर प्राप्त दस्तावेज भी बताते हैं कि आदेश के बावजूद निर्धारित समय में भुगतान नहीं हुआ। 14 मई 2026 को नियंत्रण प्राधिकारी ने विश्वविद्यालय को पत्र जारी कर बताया कि आदेश के बाद लगभग 6 माह 17 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पूर्ण भुगतान की सूचना कार्यालय को प्राप्त नहीं हुई है। इसके बाद भी अनुपालन नहीं होने पर 26 जून 2026 को पुनः पत्र जारी किया गया, जिसमें आदेश के लगभग 7 माह 29 दिन बीत जाने के बावजूद भुगतान की सूचना नहीं मिलने का उल्लेख करते हुए आगे की वैधानिक कार्रवाई की बात कही गई। अंततः 4 अगस्त 2026 को ₹1,50,240 का भुगतान किया गया। इस प्रकार 28 अक्टूबर 2025 के आदेश के करीब नौ माह बाद कर्मचारी को उसकी ग्रेच्युटी की राशि प्राप्त हो सकी।

“संस्था में ग्रेच्युटी देने का कोई प्रावधान नहीं”— HR कार्यालय के कथित जवाब ने खड़े किए नए सवाल
इसी विषय में जब हमारे न्यूज चैनल ने संस्था के ऐसे कर्मचारी जो विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके है से संपर्क किया तब एक कर्मचारी ने भी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि उन्होंने संस्था में लगभग 15 वर्षों से अधिक सेवा प्रदान किया है। हाल ही में विश्वविद्यालय द्वारा सेवानिवृत्त भी किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद जब उन्होंने अपनी ग्रेच्युटी को लेकर विश्वविद्यालय के मानव संसाधन (HR) कार्यालय में चर्चा की, तो वहां मौजूद अधिकारी द्वारा कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि “हमारी संस्था में ग्रेच्युटी देने का कोई प्रावधान नहीं है। ”कर्मचारी के इस कथित दावे ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। क्योंकि RTI से उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इसी विश्वविद्यालय के पूर्व कर्मचारी के मामले में सक्षम प्राधिकारी के आदेश के बाद ग्रेच्युटी राशि का भुगतान विश्वविद्यालय द्वारा किया जा चुका है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि—यदि विश्वविद्यालय में ग्रेच्युटी देने का कोई प्रावधान ही नहीं है, तो फिर दूसरे कर्मचारी को ग्रेच्युटी किस आधार पर और किस प्रावधान के तहत भुगतान किया गया? और यदि विश्वविद्यालय में ग्रेच्युटी का प्रावधान लागू है, तो सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को HR कार्यालय में इसके विपरीत जानकारी क्यों दी गई?
क्या अलग-अलग कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी को लेकर अलग-अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं? यह विरोधाभास विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक और गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
शासन प्रशासन सहित नियामकीय भूमिका पर उठे सवाल
डॉ. सीवी रमन विश्वविद्यालय का यह कोई पहला मामला नही बल्कि इसके पूर्व भी विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग, राजभवन और अन्य शासकीय कार्यालयों तक कई शिकायतें एवं पत्राचार पहुंचते रहे हैं। कर्मचारियों की सेवा संबंधी शिकायतों, दस्तावेजों और विश्वविद्यालय की ओर से प्रस्तुत जवाबों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में गंभीर प्रश्न यह है कि यदि किसी सक्षम शासकीय प्राधिकारी का आदेश भी समय पर लागू नहीं होता, तो निजी विश्वविद्यालय की जवाबदेही आखिर किसके प्रति है? लगातार शिकायतें, शासकीय पत्राचार और आदेशों के अनुपालन में देरी के बीच अब सवाल विश्वविद्यालय से ज्यादा उस व्यवस्था पर भी है जो निजी विश्वविद्यालयों को नियंत्रित और जवाबदेह बनाने के लिए बनाई गई है।
क्या छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालय विनियमन की व्यवस्था इतनी शिथिल हो चुकी है कि सरकारी आदेशों और नियामक निर्देशों के अनुपालन के लिए भी कर्मचारियों को महीनों संघर्ष करना पड़े? आखिर नियम-कानून और आयोग की मौजूदगी के बावजूद यदि मनमानी पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है, तो फिर यह विश्वविद्यालय आखिर किसके भरोसे चल रहा है?
फिलहाल यह मामला जांच का विषय है। अब देखना होगा कि प्रशासन और नियामकीय संस्थाएं इस पूरे घटनाक्रम पर कोई ठोस कार्रवाई करती हैं या फिर आदेशों के अनुपालन और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े सवालों का यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है।
टीप:- उपरोक्त समाचार से संबंधित समस्त प्रमाणित दस्तावेज RK NEWS 24 के पास उपलब्ध है।





