
डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय की B.Lib. डिग्री की मान्यता से जुड़ा पुराना मामला फिर चर्चा में,
2013 में जिला पंचायत ने 41 अभ्यर्थियों की अंकसूचियों पर विश्वविद्यालय से मांगा था जवाब, 2026 में जिला पंचायत ने कहा —“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं”
बिलासपुर : डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, करगीरोड-कोटा से संबंधित B.Lib. डिग्री की मान्यता का करीब 13 वर्ष पुराना मामला एक बार फिर से चर्चा का विषय बना हुआ है। जिला पंचायत कार्यालय से सामने आए सरकारी दस्तावेजों में वर्ष 2013 के आधिकारिक पत्र और वर्ष 2026 के RTI जवाब के बीच दिखाई दे रहा अंतर अब रिकॉर्ड की पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग को जन्म दे रहा है।
क्या है पूरा मामला ?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 27 अप्रैल 2013 को जिला पंचायत बिलासपुर के तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने विश्वविद्यालय के कुल सचिव को पत्र क्रमांक 303/जि.पं./शिक्षा स्था./2013-14 जारी किया था। पत्र में शिक्षक पंचायत के ग्रंथपाल पद की भर्ती का उल्लेख करते हुए बताया गया कि आवेदन करने वालों में 41 अभ्यर्थियों ने डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय से B.Lib. की अंकसूची प्रस्तुत की थी। वही कुछ अन्य अभ्यर्थियों द्वारा इन प्रमाण-पत्रों की मान्यता पर आपत्ति किए जाने के बाद जिला पंचायत ने विश्वविद्यालय से B.Lib. पाठ्यक्रम की मान्यता के संबंध में आधिकारिक जानकारी मांगी थी।

13 वर्ष बाद RTI में सामने आया बिल्कुल अलग जवाब
अब 24 जुलाई 2026 को मांगी गई RTI जानकारी के जवाब में जिला पंचायत कार्यालय बिलासपुर ने 10 अगस्त 2026 को आवेदक को कहा कि संबंधित जानकारी कार्यालय में उपलब्ध नहीं है तथा कार्यालय द्वारा B.Lib. की कोई भर्ती नहीं की गई है।

जिला पंचायत कार्यालय के जवाब ने खड़े किए कई महत्वपूर्ण सवाल
सूचना का अधिकार अधिनियम के तरह जिला पंचायत से प्राप्त जवाब ने कई अहम और गंभीर सवाल खड़े कर दिये है यदि 2013 में जिला पंचायत ने स्वयं विश्वविद्यालय के कुल सचिव को पत्र भेजकर 41 अभ्यर्थियों की B.Lib. अंकसूचियों की मान्यता के संबंध में जवाब मांगा था, तो उस पत्र की मूल नस्ती, 41 अभ्यर्थियों की सूची, विश्वविद्यालय को भेजा गया पत्र और विश्वविद्यालय से प्राप्त जवाब आज कहां है?

(फाइल फोटो)
विश्वविद्यालय की भूमिका भी जांच के दायरे में
2013 का पत्र सीधे विश्वविद्यालय के कुल सचिव को संबोधित था। इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि –
- विश्वविद्यालय ने उस समय जिला पंचायत के पत्र का क्या जवाब दिया था? और
- क्या संबंधित रिकॉर्ड आज भी विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित है।
साथ ही अब यह भी जांच का विषय बन गया है कि—
- क्या विश्वविद्यालय को जिला पंचायत से वर्ष 2013 का पत्र प्राप्त हुआ था?
- विश्वविद्यालय के पास उसका inward/receipt record उपलब्ध है या नहीं?
- विश्वविद्यालय ने जिला पंचायत को लिखित जवाब दिया था या नहीं?
- B.Lib. पाठ्यक्रम की मान्यता से संबंधित कौन-कौन से दस्तावेज उस समय उपलब्ध कराए गए थे? साथ ही आज विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में उस पत्राचार की स्थिति क्या है?
फिलहाल इन प्रश्नों का उत्तर सामने आए बिना पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकती।
विश्वविद्यालय से जुड़े कई गंभीर मामलो ने कुलाधिपति संतोष चौबे के नेतृत्व एवं संस्थागत जवाबदेही पर भी खड़े किए सवाल
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे का नाम भी इस संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि किसी भी विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता और रिकॉर्ड व्यवस्था केवल किसी एक कर्मचारी की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि यह संस्थान की समग्र प्रशासनिक जवाबदेही का विषय होती है। विगत अवधि में विश्वविद्यालय से जुड़े अनेक कर्मचारियों की शिकायतों, कथित उत्पीड़न तथा विभिन्न सरकारी/ संवैधानिक संस्थाओं से प्राप्त पत्रों के जवाब में कथित देरी अथवा जवाब प्रस्तुत न किए जाने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इन सभी मामलों में यदि देखा जाए तो किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान के शीर्ष पदाधिकारी से संस्थागत पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी संस्थाओं के साथ पूर्ण सहयोग की अपेक्षा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसी स्थिति में किसी भी शिकायत, दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के सम्बद्ध में उठे सवाल पर शीर्ष अधिकारी से भी निष्पक्ष प्रशासनिक जांच अपेक्षा बढ़ जाती है ।

स्वतंत्र जांच क्यों है जरूरी?
पूरे मामले में वर्ष 2013 की मूल भर्ती नस्ती, 41 अभ्यर्थियों की सूची, जिला पंचायत और विश्वविद्यालय के बीच हुआ पत्राचार, dispatch/receipt records, विश्वविद्यालय का जवाब तथा रिकॉर्ड के संरक्षण अथवा नष्ट किए जाने से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच आवश्यक प्रतीत होती है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय से संबंधित आयोग और राजभवन स्तर के अन्य मामलों में उठे जवाबदेही संबंधी सवालों की भी दस्तावेजों के आधार पर समीक्षा की जानी जरूरी है। क्योंकि एक बड़ा सवाल यह बनता है कि यदि 2013 में जिला पंचायत ने विश्वविद्यालय से 41 अभ्यर्थियों की B.Lib. अंकसूचियों की मान्यता के संबंध में जवाब मांगा था। तो अब 2026 में ये क्यों कहा जा रहा है कि संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।यदि 2013 में जिस रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी कार्यालय ने विश्वविद्यालय से जवाब मांगा था, वह रिकॉर्ड आखिर 2026 तक पहुंचते-पहुंचते कहां चला गया? और
यदि वह रिकॉर्ड विश्वविद्यालय अथवा जिला पंचायत के पास मौजूद है, तो उसे सार्वजनिक जांच के लिए सामने लाने में देरी क्यों?
फिलहाल देखना यह है विश्वविद्यालय में पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड के संरक्षण, सरकारी पत्राचार और जवाबदेही की व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है? और इस पर जिला प्रशासन एवं विश्वविद्यालय के शीर्ष पदाधिकारी क्या रुख अपनाते है? क्योंकि इस मामले में स्वतंत्र जांच और तथ्यों की पारदर्शी पड़ताल ही उचित रास्ता है। यही जांच तय करेगी कि मामला महज रिकॉर्ड प्रबंधन की लापरवाही है या इसके पीछे कोई गंभीर प्रशासनिक अनियमितता मौजूद है।
टीप :- उपरोक्त खबर से संबंधित समस्त प्रमाणित दस्तावेज RK NEWS 24 के पास उपलब्ध है।





