
सहायक प्राध्यापक ने थाना प्रभारी को सौंपा लिखित आवेदन कहा — “यदि मेरे साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो जिम्मेदार होंगे विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी एवं अधिवक्ता” “
बिलासपुर/कोटा : डॉ. सी. वी. रमन विश्वविद्यालय से जुड़ा विवाद अब गंभीर मोड़ लेता नजर आ रहा है। विश्वविद्यालय के ललित संगीत कला विभाग में कार्यरत गायन विषय के सहायक प्राध्यापक श्रीप्रकाश तिवारी ने सिविल लाइन थाना बिलासपुर में लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए विश्वविद्यालय पक्ष के अधिवक्ता पर श्रम कार्यालय परिसर में गाली-गलौज, मारपीट एवं जान से मारने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगाया है।

क्या है पूरा मामला……..
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सहायक प्राध्यापक श्रीप्रकाश तिवारी ने विश्वविद्यालय प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी जिनमें कुलाधिपति संतोष चौबे, कुलपति प्रो. प्रदीप कुमार घोष, कुलसचिव डॉ. अरविंद तिवारी, सहायक उपकुलसचिव प्रशासन एवं मानव संसाधन विभाग के नीरज कश्यप तथा पुष्पा कश्यप के विरुद्ध क्षेत्रीय श्रम कार्यालय बिलासपुर में शिकायत प्रस्तुत करते हुए आरोप लगाया कि उपरोक्त अधिकारियों द्वारा आवासीय सुविधा के नाम पर पहले उनकी वेतन वृद्धि रोकी गई तथा आवासीय परिसर खाली कराने के उद्देश्य से उनका आईसेक्ट क्षेत्रीय कार्यालय स्थित वनमाली सृजन पीठ, बिलासपुर में अवैधानिक स्थानांतरण कर दिया गया। बाद में आईसेक्ट बिलासपुर संभाग के संभागीय प्रमुख योगेश मिश्रा ने उन्हें कार्यभार ग्रहण करने से वंचित कर दिया। आरोप है कि इस संबंध में लिखित में शिकायत करने के बावजूद भी कुलसचिव डॉ. अरविंद तिवारी सहित अधिकारियों ने न केवल उन्हें लंबे समय तक बिना कारण LWP (Leave Without Pay) पर रखा है बल्कि मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक प्रताड़ना भी दी गई है। प्राप्त शिकायत के आधार पर दोनों पक्षों की सुनवाई हेतु श्रमायुक्त कार्यालय द्वारा 25 मई 2026 को द्वितीय संराधान बैठक आयोजित की गई थी। आरोप है कि सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय पक्ष के अधिवक्ता आनन्द मोहन तिवारी द्वारा भेजे गए सहायक अधिवक्ता संतोष मिश्रा ने प्रार्थी प्राध्यापक के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए गाली-गलौज प्रारंभ कर दिया। पीड़ित के अनुसार, विरोध करने पर अधिवक्ता ने न केवल मारपीट की बल्कि जान से मारने की धमकी भी दी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि अधिवक्ता ने स्वयं को प्रभावशाली बताते हुए कहा कि “मैं अधिवक्ता हूं, तुम्हें अभी झूठे केस में फंसा दूंगा।” और इसके बाद अधिवक्ता ने स्वयं अपना कपड़ा फाड़ना शुरू कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो पीड़ित प्राध्यापक द्वारा अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया जिसमें अधिवक्ता संतोष मिश्रा कार्यालय परिसर में झूमाझपटी करते एवं अपना कपड़ा फाड़ते नजर आ रहे हैं। कार्यालय में सुनवाई के दौरान इसप्रकार की घटना घटित होने से हड़कंप मच गया जिसके बाद कार्यालय में पदस्थ कर्मचारियों ने बीच-बचाव कर स्थिति को नियंत्रित किया।
“घटना से अत्यंत आहत और भयभीत हूं, भविष्य में कुछ भी हुआ तो जिम्मेदार होगा विश्वविद्यालय प्रबंधन” — पीड़ित प्राध्यापक
पीड़ित सहायक प्राध्यापक श्रीप्रकाश तिवारी ने RK NEWS 24 के संवाददाता से बातचीत के दौरान बताया कि वे इस घटना से अत्यंत आहत एवं भयभीत हैं। उन्होंने सहायक श्रमायुक्त कार्यालय तथा सिविल लाइन थाना प्रभारी को लिखित में आवेदन देकर कार्यवाही की माँग की है। साथ ही भविष्य में उनके साथ किसी भी अप्रिय घटना घटित होने की आशंका व्यक्त करते हुए उन्होंने आवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि “यदि भविष्य में मेरे साथ किसी भी प्रकार की कोई भी अप्रिय घटना घटित होती है, तो इसके लिए विश्वविद्यालय प्रबंधन के संबंधित उच्च अधिकारियों सहित उनके कानूनी सलाहकार एवं सहायक अधिवक्ता जिम्मेदार होंगे।”

विश्वविद्यालय का पक्ष जानने हेतु कुल सचिव से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश लेकिन फोन नंबर पहुंच से बाहर
इस विषय में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. अरविंद तिवारी से दूरभाष के माध्यम से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, किंतु उनका मोबाइल फोन पहुंच से बाहर बताया गया।
वायरल वीडियो से आम जनता में मची खलबली उठ रहे कई अहम सवाल……
शासकीय कार्यालय परिसर में अधिवक्ता द्वारा कथित अभद्र व्यवहार और हंगामे का वीडियो सामने आने के बाद लोगों में चर्चा तेज हो गई है। साथ ही आम जनता के मन अब सवाल भी उठ रहे हैं कि
- आखिर कानून के जानकार होने के बावजूद भी अधिवक्ता की यह कैसी गुंडागर्दी है?,
- अधिवक्ता को पैरवी का अधिकार या फिर गुंडागर्दी का?
- किसके प्रतिशय पर अधिवक्ता ने किया यह अभद्रता पूर्ण कार्य?
- यदि एक वरिष्ठ शिक्षण संस्थान द्वारा नियुक्त अधिवक्ता का शासकीय कार्यालय में इस प्रकार से अभद्रता पूर्ण व्यवहार किया गया है तो इसका असली जिम्मेदार कौन?
- यदि कानून से जुड़े लोग ही कानून व्यवस्था की मर्यादा को भंग करते दिखाई देंगे तो फिर आम नागरिक आखिर किस पर भरोसा करेगा?
वास्तव में आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है। फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है। अब देखना यह होगा कि श्रम कार्यालय एवं पुलिस प्रशासन इस मामले में आगे क्या कार्यवाही करती है?







